सिवान के जैसे मिर्जापुर की भी बदनामी

आज के नौजवान से अगर बात करीएगा तो 100 से 90 लोग सिवान जिला के बारे में पहले नहीं जानते होंगे या फिर यह बोलिए कि शाहबुद्दीन जहाँ का है वो शहर फिर बोलेंगे अच्छा वह सिवान जिला हैं। 

अगर उन्हीं लोगों से पुछीएगा कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति के जिला का नाम क्या है तो अधिकतर लोग बोलेंगे कि पता नहीं तो एक दो बोलेंगे कि जीरादेई में वो पैदा हुए थे पर लगभग युवा पीढ़ी नहीं जानती  है कि सिवान जिला के ही प्रथम राष्ट्रपति डां० राजेन्द्र प्रसाद हैं।

यह बात ऐसे प्रचलित नहीं हो जाती और महापुरुष का नाम उस स्थान से मिट जाता है और लोग कुख्यात या असभ्य बातों से किसी क्षेत्र या जिला को पहचानने लगते हैं, दरअसल इसके पीछे एक दूषित तथा देशविरोधी विचारधारा है जो लगातार ऐसे बातों को लिखते रहते हैं या किसी न किसी चलचित्र के माध्यम से दिखाते रहते हैं और धीरे धीरे समान्य जनमानस उस क्षेत्र को कुख्यात या असभ्य बातों से पहचानने लगता है। 

इसी प्रकार एक नया बेबसीरीज के माध्यम से मिर्जापुर के ऐतिहासिक भूमि को आपराधिक, व्यभिचारी क्षेत्र के रूप में पहचान बनाने में लगे हैं और अब शायद देश, दुनिया मिर्जापुर को इसी प्रकार इस क्षेत्र को मानेगी। 
पर इस क्षेत्र का इतिहास -"शहर कई पहाड़ियों से घिरा हुआ है और मिर्जापुर जिले का मुख्यालय है और यह विंध्याचल, अष्टभुजा और काली ख्ह के पवित्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है और यहां तक ​​कि देवहवा बाबा आश्रम भी है। "

माँ विन्ध्यासिनी त्रिकोण यन्त्र पर स्थित तीन रूपों को धारण करती हैं जो की महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली हैं। मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता।

देवी को उनका नाम विंध्य पर्वत से मिला और विंध्यवासिनी नाम का शाब्दिक अर्थ है, वह विंध्य में निवास करती हैं। जैसा कि माना जाता है कि धरती पर शक्तिपीठों का निर्माण हुआ, जहां सती के शरीर के अंग गिरे थे, लेकिन विंध्याचल वह स्थान और शक्तिपीठ है, जहां देवी ने अपने जन्म के बाद निवास करने के लिए चुना था।

इतने पौराणिक, ऐतिहासिक जगह होने के बाद भी इस क्षेत्र को उतनी पहचान न मीली जितनी बाते आज के युवा मिर्जापुर को एक बेबसीरीज से जानने लगे। 

क्या माँ विंध्यवासिनी के स्वरुप व इनके भक्ति को प्रचार प्रसार आज का मीडिया, फिल्मजगत नहीं कर सकता था पर ऐसा न करना और अपराधियों के वर्चस्व और अनैतिक संबंध व हत्या से भरा एक झूठ को दिखाया गया और प्रसारित किया गया और हम इसे देखकर खुश भी हुए और एक ऐतिहसिक सौर्य गाथा को भुला दिये।
अगर ऐसा कहानी उस क्षेत्र में है भी तो क्या उसका नाम उस क्षेत्र के नाम से चलचित्र बनाना उचित है? 
क्या कोई और देश के पवित्र क्षेत्र के नाम पर कोई व्यभिचारी कहानी का चलचित्र देखे है? 
क्यों भारत में ही यह हो रहा है???? 
यह एक खास साजिश नहीं है हमारे युवा को वहाँ के पौराणिक इतिहास से दुर करने की??? 
आप खुद विचार करे। 

ऐसे अनेको स्थान ,राज्य और क्षेत्र है जिसे बहुत ही भयानक दिखाकर उसके पौराणिक व अध्यात्मवाद के स्वरुप को दबा दिया गया और आज हम सब भूल गये या अगली पीढ़ी भुल रही हैं या भुल जाएगी।

---आशीष कुमार मिश्र 

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